GS Paper 3 · 18 अगस्त 2026
उत्तर प्रदेश में भूजल में क्रोमियम (VI) संदूषण: दशकों का औद्योगिक प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट
The Hindu की एक जाँच से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के तीन जिलों के कुछ हिस्सों में भूजल कैंसरकारी क्रोमियम (VI) के उच्च स्तर के कारण पीले-हरे रंग का दिखाई देता है, जिसका कारण दशकों से अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट डंपिंग है। दूषित जल पर निर्भर ग्रामीणों को त्वचा रोग, कैंसर और प्रजनन संबंधी बीमारियों सहित गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है। यह संदूषण पर्यावरणीय नियमों और जल गुणवत्ता निगरानी के कमजोर प्रवर्तन को रेखांकित करता है। यह पर्यावरणीय शासन विफलता सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, सामाजिक-आर्थिक असुरक्षाओं को बढ़ाती है, तथा मौजूदा कानूनों के तहत उपचार और कठोर औद्योगिक अनुपालन की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
यूपीएससी के लिए महत्व
प्राथमिक GS-3 (पर्यावरण: भूजल प्रदूषण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, जल प्रबंधन)। द्वितीयक GS-2 (शासन: पर्यावरणीय कानूनों का प्रवर्तन, स्वास्थ्य नीति)। यह जल प्रदूषण, भूजल संदूषण, पर्यावरणीय प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे पाठ्यक्रम विषयों से जुड़ता है। पाठ्यपुस्तक संदर्भ: Shankar IAS पर्यावरण (जल प्रदूषण), NCERT कक्षा 12 जीव विज्ञान (पर्यावरणीय मुद्दे), और सरकारी योजनाएँ जैसे राष्ट्रीय जल मिशन, नमामि गंगे (भूजल घटक)।
इस खबर को कैसे पढ़ें
यह मामला केवल एक प्रदूषण घटना नहीं, बल्कि पर्यावरणीय शासन की संरचनात्मक विफलता का प्रमाण है। दशकों से अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट का डंपिंग यह दर्शाता है कि नियमों का प्रवर्तन कागज़ों तक सीमित रह गया है। जब भूजल का रंग पीला-हरा दिखाई दे, तो यह संकेत है कि संदूषण इतना गहरा है कि सामान्य निस्पंदन से उसका समाधान संभव नहीं। ग्रामीण समुदाय जो वैकल्पिक जल स्रोतों से वंचित हैं, वे विवश होकर इसी जल का उपयोग करते हैं, जिससे त्वचा रोग, कैंसर और प्रजनन संबंधी बीमारियों का बोझ बढ़ता है। यह स्थिति सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा को और गहरा करती है, क्योंकि स्वास्थ्य व्यय बढ़ने से गरीब परिवार और कर्ज़ में डूबते हैं। परीक्षा की दृष्टि से यह घटना 'पर्यावरणीय न्याय' की अवधारणा से जुड़ती है—प्रदूषण का भार उन पर सबसे अधिक पड़ता है जिनके पास राजनीतिक या आर्थिक संसाधन नहीं होते। साथ ही, यह 'प्रदूषक भुगतान सिद्धांत' और 'एहतियाती सिद्धांत' के उल्लंघन का उदाहरण है। उपचार की मांग केवल तकनीकी नहीं है; इसमें औद्योगिक इकाइयों की जवाबदेही तय करना, नियमित जल गुणवत्ता निगरानी को सार्वजनिक करना और प्रभावित समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना आवश्यक है। मुख्य परीक्षा में उत्तर लिखते समय इस घटना को 'विकास बनाम पर्यावरण' के द्विध्रुव से आगे बढ़कर 'सतत विकास लक्ष्य 6' (स्वच्छ जल और स्वच्छता) से जोड़ा जा सकता है।
पेपर का व्यापक संदर्भ
GS-3 के तीनों मद पर्यावरणीय और मानवीय सुरक्षा की विफलताओं को उजागर करते हैं। उत्तर प्रदेश का क्रोमियम संदूषण और काजीरंगा का ESZ विवाद दोनों विकास बनाम संरक्षण के तनाव को दिखाते हैं, जबकि बिहार की भगदड़ आपदा प्रबंधन की प्रणालीगत चूक है। सामान्य गलती यह है कि अभ्यर्थी इन्हें केवल 'घटना' के रूप में याद करते हैं। असली माँग है: कानूनी प्रावधान (जैसे Environment (Protection) Act, 1986 या NDMA दिशा-निर्देश), संस्थागत भूमिकाएँ और सुधार के उपाय।
संभावित प्रश्न
उत्तर प्रदेश में क्रोमियम (VI) संदूषण केवल औद्योगिक लापरवाही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय शासन की बहुस्तरीय विफलता है। निगरानी, प्रवर्तन और उपचार के मौजूदा तंत्र की सीमाओं का विश्लेषण कीजिए।
त्वरित अभ्यास
Q1
The Hindu की जाँच के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में भूजल का रंग पीला-हरा दिखाई देने का प्रमुख कारण क्या है?
- क्रोमियम (VI) का उच्च स्तर
- लौह तत्व की अधिकता
- फ्लोराइड संदूषण
- आर्सेनिक प्रदूषण
उत्तर देखें
सही उत्तर: क्रोमियम (VI) का उच्च स्तर
स्रोत के अनुसार, भूजल में कैंसरकारी क्रोमियम (VI) के उच्च स्तर के कारण पीले-हरे रंग का दिखाई देता है।
Q2
इस संदूषण से प्रभावित ग्रामीणों को किन स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है?
- केवल त्वचा रोग
- केवल कैंसर
- त्वचा रोग, कैंसर और प्रजनन संबंधी बीमारियाँ
- केवल श्वसन संबंधी बीमारियाँ
उत्तर देखें
सही उत्तर: त्वचा रोग, कैंसर और प्रजनन संबंधी बीमारियाँ
स्रोत में स्पष्ट रूप से त्वचा रोग, कैंसर और प्रजनन संबंधी बीमारियों सहित गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का उल्लेख है।
संबंधित विगत वर्ष प्रश्न
- GS-3 2021: भारत में भूजल संदूषण और ह्रास
- GS-3 2019: पर्यावरणीय प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट
- GS-2 2018: पर्यावरण संरक्षण हेतु संवैधानिक निकाय