GS-3 के तीनों मद पर्यावरणीय और मानवीय सुरक्षा की विफलताओं को उजागर करते हैं। उत्तर प्रदेश का क्रोमियम संदूषण और काजीरंगा का ESZ विवाद दोनों विकास बनाम संरक्षण के तनाव को दिखाते हैं, जबकि बिहार की भगदड़ आपदा प्रबंधन की प्रणालीगत चूक है। सामान्य गलती यह है कि अभ्यर्थी इन्हें केवल 'घटना' के रूप में याद करते हैं। असली माँग है: कानूनी प्रावधान (जैसे Environment (Protection) Act, 1986 या NDMA दिशा-निर्देश), संस्थागत भूमिकाएँ और सुधार के उपाय।
The Hindu की एक जाँच से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के तीन जिलों के कुछ हिस्सों में भूजल कैंसरकारी क्रोमियम (VI) के उच्च स्तर के कारण पीले-हरे रंग का दिखाई देता है, जिसका कारण दशकों से अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट डंपिंग है। दूषित जल पर निर्भर ग्रामीणों को त्वचा रोग, कैंसर और प्रजनन संबंधी बीमारियों सहित गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है। यह संदूषण पर्यावरणीय नियमों और जल गुणवत्ता निगरानी के कमजोर प्रवर्तन को रेखांकित करता है। यह पर्यावरणीय शासन विफलता सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, सामाजिक-आर्थिक असुरक्षाओं को बढ़ाती है, तथा मौजूदा कानूनों के तहत उपचार और कठोर औद्योगिक अनुपालन की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
यूपीएससी की दृष्टि से क्यों: प्राथमिक GS-3 (पर्यावरण: भूजल प्रदूषण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, जल प्रबंधन)। द्वितीयक GS-2 (शासन: पर्यावरणीय कानूनों का प्रवर्तन, स्वास्थ्य नीति)। यह जल प्रदूषण, भूजल संदूषण, पर्यावरणीय प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे पाठ्यक्रम विषयों से जुड़ता है। पाठ्यपुस्तक संदर्भ: Shankar IAS पर्यावरण (जल प्रदूषण), NCERT कक्षा 12 जीव विज्ञान (पर्यावरणीय मुद्दे), और सरकारी योजनाएँ जैसे राष्ट्रीय जल मिशन, नमामि गंगे (भूजल घटक)।
संभावित प्रश्न: उत्तर प्रदेश में क्रोमियम (VI) संदूषण केवल औद्योगिक लापरवाही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय शासन की बहुस्तरीय विफलता है। निगरानी, प्रवर्तन और उपचार के मौजूदा तंत्र की सीमाओं का विश्लेषण कीजिए।
संबंधित विगत वर्ष प्रश्न: GS-3 2021: भारत में भूजल संदूषण और ह्रास; GS-3 2019: पर्यावरणीय प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट; GS-2 2018: पर्यावरण संरक्षण हेतु संवैधानिक निकाय
मूल स्रोत
बिहार के लखीसराय स्थित Ashok Dham मंदिर में हुई भगदड़ में सात श्रद्धालुओं, जिनमें अधिकांश महिलाएँ थीं, की मृत्यु हो गई। यह घटना तब हुई जब दो ट्रेनों में आए श्रद्धालु भगवान शिव को पवित्र जल अर्पित करने के लिए एक साथ आगे बढ़े। यह भारत में धार्मिक स्थलों पर होने वाली भगदड़ की पुनरावृत्तियों की शृंखला का नवीनतम मामला है, जो भीड़ प्रबंधन, जोखिम आकलन और आपातकालीन प्रत्युत्तर में गंभीर कमियों को उजागर करता है। यह सामूहिक आयोजनों में भीड़ नियंत्रण पर NDMA दिशा-निर्देशों के कठोर अनुपालन और धार्मिक संरचनाओं के आसपास बेहतर आधारभूत अवसंरचना नियोजन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह त्रासदी रेलवे, ज़िला प्रशासन और मंदिर प्राधिकरणों के बीच अंतर-एजेंसी समन्वय पर भी प्रश्न खड़े करती है।
यूपीएससी की दृष्टि से क्यों: प्राथमिक GS-3: आपदा प्रबंधन, विशेष रूप से सामूहिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन। यह Disaster Management Act, 2005, त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के दौरान भीड़ प्रबंधन पर NDMA दिशा-निर्देश, तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु Sendai Framework for Disaster Risk Reduction से संबंधित है। द्वितीयक GS-2: ज़िला प्रशासन और विधि-व्यवस्था। स्थैतिक संदर्भ: सामूहिक आयोजनों के स्थलों पर भीड़ प्रबंधन पर NDMA प्रकाशन (Managing Crowds at Events and Places of Mass Gathering)।
संभावित प्रश्न: बिहार मंदिर भगदड़ केवल भीड़ प्रबंधन की चूक नहीं, बल्कि आपदा-पूर्व तैयारी की प्रणालीगत विफलता है। NDMA दिशा-निर्देशों के प्रमुख घटकों और उनके क्रियान्वयन की बाधाओं की पहचान कीजिए।
संबंधित विगत वर्ष प्रश्न: GS-3 2019: किसी भी आपदा प्रबंधन प्रक्रिया में आपदा तैयारी पहला कदम है। स्पष्ट कीजिए कि भूस्खलन की स्थिति में आपदा न्यूनीकरण में संकट क्षेत्र मानचित्रण (hazard zonation mapping) किस प्रकार सहायक हो सकता है।; GS-3 2013: आपदा-पूर्व प्रबंधन के लिए सुभेद्यता और जोखिम आकलन कितने महत्वपूर्ण हैं? भारत में हाल की आपदाओं के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
मूल स्रोत
असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma ने संकेत दिया है कि काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व के चारों ओर इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) की चौड़ाई डिफ़ॉल्ट 10 km के बजाय न्यूनतम 1 km निर्धारित की जा सकती है। यह Supreme Court के 2022 के निर्देश के बाद है, जिसमें कहा गया था कि संरक्षित क्षेत्रों के आसपास कम से कम 1 km का अनिवार्य ESZ बनाए रखा जाना चाहिए, और राज्यों को व्यापक क्षेत्र अधिसूचित करने की अनुमति है। इस प्रस्ताव ने विवाद उत्पन्न कर दिया है, क्योंकि संरक्षणवादी चेतावनी दे रहे हैं कि संकीर्ण बफर वन्यजीव गलियारों को कमजोर करेगा, मानव-पशु संघर्ष बढ़ाएगा और UNESCO विश्व धरोहर स्थल में जैव विविधता संरक्षण को कमजोर करेगा। यह मुद्दा संरक्षित क्षेत्रों के निकट विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के बीच संतुलन पर भी प्रश्न उठाता है।
यूपीएससी की दृष्टि से क्यों: प्राथमिक GS-3: पर्यावरण, संरक्षण, जैव विविधता। यह Environment (Protection) Act, 1986 के तहत इको-सेंसिटिव ज़ोन, ESZ पर Supreme Court के आदेश, वन्यजीव संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़ा है। द्वितीयक GS-2: पर्यावरण शासन में केंद्र-राज्य भूमिकाएँ। स्थैतिक संदर्भ: Shankar IAS Environment के 'Protected Area Network and Eco-Sensitive Zones' अध्याय में।
संभावित प्रश्न: काजीरंगा के ESZ को 10 km से घटाकर 1 km करने का प्रस्ताव संरक्षण और विकास के बीच किस प्रकार का संतुलन माँगता है? Supreme Court के 2022 के निर्देश और Environment (Protection) Act, 1986 के प्रावधानों के आलोक में विश्लेषण कीजिए।
संबंधित विगत वर्ष प्रश्न: GS-3 2021: संरक्षित क्षेत्रों के आसपास अधिसूचित इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) के उद्देश्य की व्याख्या करें।; GS-3 2018: भारत में जैव विविधता किस प्रकार भिन्न होती है? वनस्पतियों और जीवों के संरक्षण में Biological Diversity Act, 2002 किस प्रकार सहायक है?
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