दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद का कार्यसूची सहकारी संघवाद की परामर्शी संरचना को रेखांकित करती हैराजव्यवस्था और शासन

GS Paper 2 · 20 अगस्त 2026

दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद का कार्यसूची सहकारी संघवाद की परामर्शी संरचना को रेखांकित करती है

गृह मंत्रालय ने महाबलीपुरम में 31वीं दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद बैठक की घोषणा की। परिषद में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के साथ पुडुचेरी, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह तथा लक्षद्वीप शामिल हैं। क्षेत्रीय परिषदें राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धाराओं 15 से 22 के अंतर्गत स्थापित हैं और उनकी भूमिका परामर्शी है। मुख्य सचिवों की स्थायी समिति राज्यों के प्रस्तावों पर पहले विचार करती है; शेष विषय परिषद के समक्ष आते हैं। घोषित कार्यसूची में जल बंटवारा, आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, नागरिक उड्डयन, शिक्षा, आवास और Fast Track Special Courts जैसे अंतर-राज्य तथा केंद्र-राज्य प्रश्न शामिल हैं। आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार जून 2014 से लगभग 12 वर्षों में परिषदों और उनकी स्थायी समितियों की 69 बैठकें हुईं। इसका महत्व संरचित वार्ता में है, बाध्यकारी निर्णय में नहीं।

यूपीएससी के लिए महत्व

GS Paper 2 में परिषद न्यायालयों और औपचारिक वित्तीय निकायों के बाहर सहकारी संघवाद का उदाहरण है। इसकी शक्ति बार-बार होने वाला संवाद, वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कार्यसूची की तैयारी तथा मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय गृह मंत्री का राजनीतिक स्वामित्व है। परामर्शी स्वरूप इसकी सीमा भी है, क्योंकि क्रियान्वयन सहमति, विभागीय अनुवर्ती कार्रवाई और पारदर्शी निगरानी पर निर्भर करता है। उत्तर में वार्ता मंच और न्यायनिर्णय तंत्र की तुलना करते हुए जल, पुनर्गठन और सीमा-पार सेवाओं में राजनीतिक समायोजन तथा विधिक स्पष्टता दोनों की जरूरत बतानी चाहिए।

इस खबर को कैसे पढ़ें

क्षेत्रीय परिषदें अनौपचारिक राजनीतिक वार्ता और बाध्यकारी न्यायिक समाधान के बीच स्थित हैं। वैधानिक आधार निरंतरता देता है, जबकि परामर्शी स्वरूप विभागों और सरकारों के बीच सौदेबाजी वाले विषयों में लचीलापन रखता है। स्थायी समिति तकनीकी प्रश्न छांट सकती है और राजनीतिक नेतृत्व की बैठक से पहले विकल्प तैयार कर सकती है। जल, परिवहन, शिक्षा, आवास और पुनर्गठन जैसे विषयों में यह बहु-स्तरीय प्रक्रिया उपयोगी है, क्योंकि समाधान के लिए समानांतर प्रशासनिक कार्रवाई चाहिए। फिर भी परामर्शी स्थिति अनुवर्ती चुनौती बनाती है; समयसीमा, वित्त या उत्तरदायित्व का सार्वजनिक अभिलेख न हो तो सहमति कमजोर पड़ सकती है। जहां विधिक अधिकारों पर प्रामाणिक निर्णय आवश्यक हो, परिषद संवैधानिक न्यायनिर्णय का विकल्प नहीं है। Mains उत्तर में इसे न तो निष्प्रभावी वार्ता मंच कहें, न पूर्ण विवाद समाधान निकाय। कार्यसूची निर्माण, बार-बार संवाद, सूचना साझाकरण और भरोसा निर्माण का मूल्यांकन करें, फिर पारदर्शिता और क्रियान्वयन निगरानी देखें। सुधार में आवश्यक गोपनीय वार्ता बचाते हुए निर्णय, उत्तरदायी एजेंसी और प्रगति सूचक सार्वजनिक किए जा सकते हैं। सहकारी संघवाद तब सार्थक है जब परामर्श प्रशासनिक व्यवहार और स्वीकार्य, विधिसम्मत परिणाम बदलता है।

पेपर का व्यापक संदर्भ

शासन विषयों को संस्थागत डिजाइन से पढ़िए। परामर्शी संघीय मंच, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय क्षमता साझेदारी बैठक के बाद समन्वय, विश्वसनीय सूचना और क्रियान्वयन पर निर्भर हैं। उत्तर में विधिक प्राधिकार तथा प्रशासनिक प्रभाव अलग करते हुए पहुंच, कारणयुक्त निर्णय, गरिमा, जवाबदेही और नागरिक परिणामों से सफलता मापिए।

संभावित प्रश्न

अंतर-राज्य और केंद्र-राज्य विषयों के समाधान हेतु परामर्शी संस्थाओं के रूप में क्षेत्रीय परिषदों के योगदान और सीमाओं का आकलन कीजिए।

त्वरित अभ्यास

  1. Q1

    क्षेत्रीय परिषद का संस्थागत स्वरूप क्या है?

    1. वित्त आयोग का विकल्प
    2. बाध्यकारी संवैधानिक निर्णय देने वाला न्यायालय
    3. निजी मध्यस्थता निकाय
    4. अंतर-सरकारी परामर्श का वैधानिक परामर्शी मंच
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: अंतर-सरकारी परामर्श का वैधानिक परामर्शी मंच

    क्षेत्रीय परिषदों का वैधानिक आधार है, लेकिन उनकी अनुशंसाएं परामर्शी हैं।

  2. Q2

    स्थायी समिति प्रक्रिया का प्रमुख मूल्य क्या है?

    1. राजनीतिक विचार से पहले तकनीकी तैयारी
    2. राज्य भागीदारी हटाना
    3. हर प्रस्ताव का स्वतः प्रवर्तन
    4. विधायी समीक्षा बदलना
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: राजनीतिक विचार से पहले तकनीकी तैयारी

    मुख्य सचिव स्तर की तैयारी राजनीतिक नेतृत्व के सामने जाने से पहले तथ्य और विकल्प स्पष्ट कर सकती है।

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